अरे ये क्या! मोदी और जेटली तो ‘अच्छे दिन’ के बजाय ‘मुश्किल दिनों’ का संकेत दे रहे हैं!
दो मशहूर कहावतें हैं – ‘पूत के पाँव पालने में ही नज़र आते हैं’ और ‘होनहार वीरवान के होत चीकने पात’. दोनों कहावतों का ताल्लुक सन्तानों में दिखने वाली उम्मीदों से है. वित्त मंत्री अरूण जेटली के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था ही उनकी पेशेवर सन्तान है. इसी सन्तान के बारे में उनका नज़रिया बहुत मायूसी भरी है. दोनों मुहावरों के बिल्कुल उलट. इससे तो लगता है कि साल 2016 में भी ‘अच्छे दिन’ नहीं आ पाएँगे. उल्टा अब ‘मुश्किल दिन’ दस्तक देने वाले हैं! क्योंकि जेटली ने कहा है कि सरकार के पास बढ़ी हुई तनख़्वाहें देने और जनहितकारी योजनाओं को जारी रखने के लिए संसाधन नहीं है. इसके लिए अर्थव्यवस्था की विकास दर में कम से कम एक-डेढ़ फ़ीसदी का और इज़ाफ़ा होना चाहिए. अभी इसके सात-साढ़े फ़ीसदी के बीच रहने का अनुमान है.
जेटली बहुत दूर की बात कह रहे हैं. उनके सियासी व्यक्तित्व की वजह से इसमें सच और झूठ, दोनों शामिल हैं! इसीलिए इसे ‘सार-सार को गहि रहे थोथा देई उड़ाय’ की तरह समझना होगा. बीजेपी से जुड़े कामगारों के संगठन ‘भारतीय मज़दूर संघ’ (बीएमएस) की ओर से 30 जनवरी को दिल्ली में आयोजित एक ‘सम्मान समारोह’ का मौका था. इस ‘पारिवारिक’ आयोजन में ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल और श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय भी मौज़ूद थे. इस मौके पर मज़दूरों की नेतागिरी करने वाले संघ के स्वयंसेवकों की सम्मानित किये गये वित्त मंत्री अरूण जेटली से अपेक्षा थी कि वो सातवें केन्द्रीय वेतन आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने की तारीख़ का ऐलान कर दें. ताकि प्रतिद्वन्दी मज़दूर संगठनों के बीच बीएमएस की धाक बढ़ सके.
आयोजन में कोई ख़राबी नहीं थी. सभी पार्टियाँ ऐसा करती हैं. लेकिन इस मौके पर जेटली ने अर्थव्यवस्था की जो तस्वीर सामने रखी वो चिन्ताजनक है. जेटली ने कहा कि सातवें वेतन आयोग और ‘वन रैंक वन पेंशन’ की वजह से साल 2016-17 में केन्द्र सरकार पर 1.02 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ने वाला है. ऐसे भारी बोझ को तभी बर्दाश्त किया जा सकता है, जब सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि दर में कम से कम एक से डेढ़ फ़ीसदी का और इज़ाफ़ा हो. यानी मौजूदा वृद्धि दर की बदौलत सरकार को अपना बोझ ख़ुद उठाने में मुश्किल होगी. ये आलम तब है जबकि अक्टूबर में अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने साल 2016 में वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए 3.6% की विकास दर का अनुमान लगाया था.
भारत की विकास दर की रफ़्तार तो इससे दोगुनी है. लेकिन जेटली और तेज़ चाहते हैं. सातवें वेतन आयोग ने नये साल से केन्द्र सरकार के 50 लाख कर्मचारियों के वेतन-भत्तों में 23.55% का इज़ाफ़ा करने की सिफ़ारिश की है. कैबिनेट इसे मंज़ूर कर चुकी है. इसे लागू करने का फ़ार्मूला भी बन चुका है. लेकिन तारीख़ का ऐलान करने से पहले सरकार का इरादा ट्रेड यूनियन्स से बात करने का भी है. क्योंकि बक़ौल जेटली, ‘सरकार चाहती है कि आर्थिक विकास का पहला फ़ायदा ग़रीबों और मज़दूरों को मिले. उनका न्यूनतम वेतन कम से कम सम्मानजनक और महँगाई की भरपायी करने वाला तो हो.’ ये तभी सम्भव है जब अर्थव्यवस्था की विकास दर साढ़े आठ से नौ फ़ीसदी के बीच हो.
मज़दूरों और ग़रीबों के न्यूनतम वेतन का हाल बहुत बुरा है. वो बेचारे चौतरफ़ा शोषण के दलदल में फँसे हैं. उन्हें रोज़गार देने वाले अधिकतर सम्पन्न लोग न्यूनतम वेतन क़ानून को धड़ल्ले से ठेंगा दिखाते हैं. शोषण के ख़िलाफ़ उनकी कोई आवाज़ सुनी नहीं जाती. श्रम विभाग के अफ़सर होते हैं मज़दूरों के हितों के संरक्षण के लिए. लेकिन वो मालिकों से रिश्वत ऐंठकर सारे ग़ैरक़ानूनी ढ़र्रे को क़ायम रखते हैं. मज़जूर अपनी फ़ैक्ट्री में आवाज़ उठा नहीं सकते क्योंकि नौकरी से बाहर कर दिये जाएँगे. श्रम विभाग में सुनवाई है नहीं. कोर्ट जाएँ तो पता नहीं है कि जीते-जी भी न्याय पा सकेंगे या नहीं. वैसे इस अन्धेर का मोदी-राज से कोई नाता नहीं हैं. ऐसी अन्धेरगर्दी तो काँग्रेसी राज की देन है. बहरहाल, मज़दूरों और ग़रीबों ने ‘अच्छे दिन’ के जो ख़्वाब देखे थे, वो उनकी आँखों में ही दफ़्न हैं! कोई बदलाव नहीं है. शोषण बदस्तूर जारी है.
विकास दर में तेज़ी लाने के लिए निवेश में तेज़ी लाना ज़रूरी है. लेकिन जब सरकार अपने ही ख़र्च के बोझ तले दबी हो तो विकास के लिए सरकारी निवेश की ताक़त कहाँ से आएगी! इसका विकल्प है – विदेशी निवेश और निजी क्षेत्र का निवेश. लेकिन निजी क्षेत्र के निवेश की रफ़्तार बहुत कमज़ोर है. अमेरिका ने क़रीब एक दशक बाद ब्याज़ दर को बढ़ाकर और चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था को निर्यात-उन्मुख की जगह ख़पत-उन्मुख बनाने का रास्ता पकड़ लिया है, उसका मतलब यही कि वैश्विक मन्दी का दौर अभी जारी रहेगा. विकसित देशों में मन्दी है, इसलिए विदेशी निवेश का सहारा भी हौसला बढ़ाने वाला नहीं हो सकता. यही मुश्किल दिनों के संकेत हैं.
इसीलिए जेटली ने बारीक़ी से समझाया कि किसी भी अर्थव्यवस्था को तेज़ी से खींचने के लिए कई तरह के इंज़नों की ज़रूरत पड़ती है. जैसे वैश्विक माहौल का असर भी एक इंज़न होता है. लेकिन दुर्भाग्य से ये भारत के पक्ष में नहीं है. दूसरा इंज़न है निजी निवेश – लेकिन इसमें भी ख़ास दम नहीं है. तीसरा इंज़न हो सकता है बम्पर कृषि पैदावार. कृषि प्रधान भारत में बढ़िया मॉनसून की बड़ी भूमिका है. लेकिन ख़राब मॉनसून से ये भी बेहाल है. फ़िलहाल, भारत के पास निजी निवेश के अलावा कोई सार्थक विकल्प नहीं है. इसे स्टार्ट-अप और टेलीकॉम जैसे क्षेत्रों में लगाने पर ही ख़पत बढ़ेगी. कच्चे तेल के भाव ने सरकार के लिए ‘बिल्ली के भाग्य से छीका टूटा’ जैसा काम किया है. इसकी वजह से ही सरकार निवेश के लिए कुछ संसाधन जुटा पा रही है. फ़िलहाल, मौज़ूदा विकास दर को क़ायम रखने में सरकारी निवेश ही विकास के सबसे इंज़न की भूमिका निभा रहा है.
जेटली बहुत दूर की बात कह रहे हैं. उनके सियासी व्यक्तित्व की वजह से इसमें सच और झूठ, दोनों शामिल हैं! इसीलिए इसे ‘सार-सार को गहि रहे थोथा देई उड़ाय’ की तरह समझना होगा. बीजेपी से जुड़े कामगारों के संगठन ‘भारतीय मज़दूर संघ’ (बीएमएस) की ओर से 30 जनवरी को दिल्ली में आयोजित एक ‘सम्मान समारोह’ का मौका था. इस ‘पारिवारिक’ आयोजन में ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल और श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय भी मौज़ूद थे. इस मौके पर मज़दूरों की नेतागिरी करने वाले संघ के स्वयंसेवकों की सम्मानित किये गये वित्त मंत्री अरूण जेटली से अपेक्षा थी कि वो सातवें केन्द्रीय वेतन आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने की तारीख़ का ऐलान कर दें. ताकि प्रतिद्वन्दी मज़दूर संगठनों के बीच बीएमएस की धाक बढ़ सके.
आयोजन में कोई ख़राबी नहीं थी. सभी पार्टियाँ ऐसा करती हैं. लेकिन इस मौके पर जेटली ने अर्थव्यवस्था की जो तस्वीर सामने रखी वो चिन्ताजनक है. जेटली ने कहा कि सातवें वेतन आयोग और ‘वन रैंक वन पेंशन’ की वजह से साल 2016-17 में केन्द्र सरकार पर 1.02 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ने वाला है. ऐसे भारी बोझ को तभी बर्दाश्त किया जा सकता है, जब सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि दर में कम से कम एक से डेढ़ फ़ीसदी का और इज़ाफ़ा हो. यानी मौजूदा वृद्धि दर की बदौलत सरकार को अपना बोझ ख़ुद उठाने में मुश्किल होगी. ये आलम तब है जबकि अक्टूबर में अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने साल 2016 में वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए 3.6% की विकास दर का अनुमान लगाया था.
भारत की विकास दर की रफ़्तार तो इससे दोगुनी है. लेकिन जेटली और तेज़ चाहते हैं. सातवें वेतन आयोग ने नये साल से केन्द्र सरकार के 50 लाख कर्मचारियों के वेतन-भत्तों में 23.55% का इज़ाफ़ा करने की सिफ़ारिश की है. कैबिनेट इसे मंज़ूर कर चुकी है. इसे लागू करने का फ़ार्मूला भी बन चुका है. लेकिन तारीख़ का ऐलान करने से पहले सरकार का इरादा ट्रेड यूनियन्स से बात करने का भी है. क्योंकि बक़ौल जेटली, ‘सरकार चाहती है कि आर्थिक विकास का पहला फ़ायदा ग़रीबों और मज़दूरों को मिले. उनका न्यूनतम वेतन कम से कम सम्मानजनक और महँगाई की भरपायी करने वाला तो हो.’ ये तभी सम्भव है जब अर्थव्यवस्था की विकास दर साढ़े आठ से नौ फ़ीसदी के बीच हो.
मज़दूरों और ग़रीबों के न्यूनतम वेतन का हाल बहुत बुरा है. वो बेचारे चौतरफ़ा शोषण के दलदल में फँसे हैं. उन्हें रोज़गार देने वाले अधिकतर सम्पन्न लोग न्यूनतम वेतन क़ानून को धड़ल्ले से ठेंगा दिखाते हैं. शोषण के ख़िलाफ़ उनकी कोई आवाज़ सुनी नहीं जाती. श्रम विभाग के अफ़सर होते हैं मज़दूरों के हितों के संरक्षण के लिए. लेकिन वो मालिकों से रिश्वत ऐंठकर सारे ग़ैरक़ानूनी ढ़र्रे को क़ायम रखते हैं. मज़जूर अपनी फ़ैक्ट्री में आवाज़ उठा नहीं सकते क्योंकि नौकरी से बाहर कर दिये जाएँगे. श्रम विभाग में सुनवाई है नहीं. कोर्ट जाएँ तो पता नहीं है कि जीते-जी भी न्याय पा सकेंगे या नहीं. वैसे इस अन्धेर का मोदी-राज से कोई नाता नहीं हैं. ऐसी अन्धेरगर्दी तो काँग्रेसी राज की देन है. बहरहाल, मज़दूरों और ग़रीबों ने ‘अच्छे दिन’ के जो ख़्वाब देखे थे, वो उनकी आँखों में ही दफ़्न हैं! कोई बदलाव नहीं है. शोषण बदस्तूर जारी है.
विकास दर में तेज़ी लाने के लिए निवेश में तेज़ी लाना ज़रूरी है. लेकिन जब सरकार अपने ही ख़र्च के बोझ तले दबी हो तो विकास के लिए सरकारी निवेश की ताक़त कहाँ से आएगी! इसका विकल्प है – विदेशी निवेश और निजी क्षेत्र का निवेश. लेकिन निजी क्षेत्र के निवेश की रफ़्तार बहुत कमज़ोर है. अमेरिका ने क़रीब एक दशक बाद ब्याज़ दर को बढ़ाकर और चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था को निर्यात-उन्मुख की जगह ख़पत-उन्मुख बनाने का रास्ता पकड़ लिया है, उसका मतलब यही कि वैश्विक मन्दी का दौर अभी जारी रहेगा. विकसित देशों में मन्दी है, इसलिए विदेशी निवेश का सहारा भी हौसला बढ़ाने वाला नहीं हो सकता. यही मुश्किल दिनों के संकेत हैं.
इसीलिए जेटली ने बारीक़ी से समझाया कि किसी भी अर्थव्यवस्था को तेज़ी से खींचने के लिए कई तरह के इंज़नों की ज़रूरत पड़ती है. जैसे वैश्विक माहौल का असर भी एक इंज़न होता है. लेकिन दुर्भाग्य से ये भारत के पक्ष में नहीं है. दूसरा इंज़न है निजी निवेश – लेकिन इसमें भी ख़ास दम नहीं है. तीसरा इंज़न हो सकता है बम्पर कृषि पैदावार. कृषि प्रधान भारत में बढ़िया मॉनसून की बड़ी भूमिका है. लेकिन ख़राब मॉनसून से ये भी बेहाल है. फ़िलहाल, भारत के पास निजी निवेश के अलावा कोई सार्थक विकल्प नहीं है. इसे स्टार्ट-अप और टेलीकॉम जैसे क्षेत्रों में लगाने पर ही ख़पत बढ़ेगी. कच्चे तेल के भाव ने सरकार के लिए ‘बिल्ली के भाग्य से छीका टूटा’ जैसा काम किया है. इसकी वजह से ही सरकार निवेश के लिए कुछ संसाधन जुटा पा रही है. फ़िलहाल, मौज़ूदा विकास दर को क़ायम रखने में सरकारी निवेश ही विकास के सबसे इंज़न की भूमिका निभा रहा है.
ऐसी तंगहाली के माहौल में तो मोदी सरकार को संसद में वस्तु एवं सेवा कर (GST) विधेयक को पारित करवाने के प्रति अति गम्भीरता दिखानी चाहिए थी. लेकिन सरकार की नीति काँग्रेस आलाक़मान की नाक में दम करने की थी. इसीलिए परदे के पीछे से नैशनल हेराल्ड मामले को ख़ूब हवा दी गयी. बीजेपी को मालूम था कि तीर के निशाने पर लगते ही काँग्रेसी तिलमिलाएँगे. संसद को वैसे ही निशाना बनाएँगे जैसा मॉनसून सत्र में ललित-गेट काँड के नाम पर हुआ था. सब कुछ बिल्कुल पटकथा के मुताबिक हुआ. लेकिन जीएसटी के अटकने से नुक़सान किसे हुआ? सरकार और देश को! क्योंकि सरकार को मालूम है कि जीएसटी के लागू होने से अर्थव्यवस्था में डेढ़-दो फ़ीसदी की तेज़ी आसानी से आ जाएगी.
लिहाज़ा, यदि मोदी सरकार ने जीएसटी बिल पर काँग्रेस को पटाकर लचीला रूख़ दिखाया होता तो बल्ले-बल्ले भी बीजेपी की ही होती! बीजेपी ये भूल रही है कि उसने भी तो संसद का चक्का जाम करके सत्ता तक पहुँचने का रास्ता बनाया था. काँग्रेस को भी बीजेपी के नक़्शे-क़दम पर चलने से फ़ायदा ही हो रहा है. बिहार, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और छत्तीसगढ़ में हुए हाल के चुनावों में जनता ने काँग्रेस को मुस्कुराने का मौका दे दिया है. लेकिन नरेन्द्र मोदी के प्रमुख रणनीतिकार अरूण जेटली ना जाने किस मुग़ालते में जी रहे हैं! कहते हैं कि ‘काँग्रेस की राज्यसभा में संख्या सिकुड़ रही है. लिहाज़ा ऐसा वक़्त आने वाला है कि काँग्रेस का राज्यसभा में कोई दबदबा ही नहीं बचेगा. इसी से जीएसटी विधेयक पारित हो जाएगा!’
राज्यसभा में सदन के नेता अरूण जेटली का ये बयान तकनीकी रूप से ग़लत है. सच को बरगलाने वाला है. क्योंकि सच्चाई ये है कि यदि बीजेपी, 2019 तक होने वाले हरेक विधानसभा चुनाव को जीतती चली जाए तो भी राज्यसभा में उसका बहुमत मोदी सरकार के मौजूदा कार्यकाल में कभी नहीं हो पाएगा. राज्यसभा की बनावट ही ऐसी है कि संसद में वही सरकार क़ामयाब हो सकती है जो लोक-लाज़ के प्रति लचीला रूख़ दिखाते हुए और विपक्ष के साथ ‘कभी नरम कभी गरम’ रहते हुए अपना हित साधने पर ज़ोर देने की रणनीति से चले. क्योंकि अन्ततः चुनावी वादों को पूरा करने और जनता की अपेक्षाओं पर ख़रा उतरने की ज़िम्मेदारी तो सरकार की है. साख़ तो सरकार की दाँव पर लगी होती है. सरकार के पास सीमित समय होता है.
विपक्ष को अपने पाँच साल काटने है. विपक्ष का काम सरकार को सफ़ल बनाना नहीं है. उसे कौन सा जनता को जबाव देना है! उसे तो जायज़ हो या नाजायज़, सरकार से सिर्फ़ सवाल पूछना होता है! सरकार को कटघरे में ख़ड़ा करना होता है! विपक्ष के पास गँवाने के लिए कुछ नहीं होता! इसीलिए सरकार यदि संसद में विपक्ष से निपटने की राह पर चलेगी तो अपना अहित ही करेगी. संसद में देख लेने की बातें तो ‘संख्या बल में कमज़ोर’ विपक्ष ही करता है. लेकिन जेटली के तेवर से तो यही लगता है कि बीजेपी, अभी तक अपनी विपक्षी मानसिकता से उबर नहीं पायी है! उधर, सत्ता का लम्बा तज़ुर्बा रखने वाली काँग्रेस को बीजेपी की कमज़ोरियों के बारे में अच्छी तरह से पता है! जैसे फ़ैमिली डॉक्टर को मरीज़ का अतीत मालूम होता है!
इसीलिए, बीजेपी के रणनीतिकार को काँग्रेस के ‘कठिन दिनों’ से ज़्यादा परवाह अपने ‘मुश्किल दिनों’ की होनी चाहिए! नरेन्द्र मोदी के लिए वक़्त तेज़ी से भाग रहा है, जबकि काँग्रेस के लिए तो ये काटने के दिन हैं! अफ़सोस ये है कि ख़ुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी काँग्रेस की चाल को नहीं समझ पा रहे हैं. उन्होंने भी नोएडा में दिये अपने भाषण में जेटली की तरह ही काँग्रेस को ‘सदाचार’ का उपदेश दिया. मोदी भी ये समझ नहीं पा रहे हैं कि काँग्रेस की ओर से फ़ैलाये जा रहे कीचड़ से अपने विकास के रथ को बाहर निकालने का दारोमदार उन पर ही है. लोकसभा के चुनाव अभी बहुत दूर हैं. अभी काँग्रेस की कलई खोलने से उन्हें कुछ भी हासिल नहीं होगा! जनता की यादाश्त बहुत छोटी होती है!
लिहाज़ा, यदि मोदी सरकार ने जीएसटी बिल पर काँग्रेस को पटाकर लचीला रूख़ दिखाया होता तो बल्ले-बल्ले भी बीजेपी की ही होती! बीजेपी ये भूल रही है कि उसने भी तो संसद का चक्का जाम करके सत्ता तक पहुँचने का रास्ता बनाया था. काँग्रेस को भी बीजेपी के नक़्शे-क़दम पर चलने से फ़ायदा ही हो रहा है. बिहार, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और छत्तीसगढ़ में हुए हाल के चुनावों में जनता ने काँग्रेस को मुस्कुराने का मौका दे दिया है. लेकिन नरेन्द्र मोदी के प्रमुख रणनीतिकार अरूण जेटली ना जाने किस मुग़ालते में जी रहे हैं! कहते हैं कि ‘काँग्रेस की राज्यसभा में संख्या सिकुड़ रही है. लिहाज़ा ऐसा वक़्त आने वाला है कि काँग्रेस का राज्यसभा में कोई दबदबा ही नहीं बचेगा. इसी से जीएसटी विधेयक पारित हो जाएगा!’
राज्यसभा में सदन के नेता अरूण जेटली का ये बयान तकनीकी रूप से ग़लत है. सच को बरगलाने वाला है. क्योंकि सच्चाई ये है कि यदि बीजेपी, 2019 तक होने वाले हरेक विधानसभा चुनाव को जीतती चली जाए तो भी राज्यसभा में उसका बहुमत मोदी सरकार के मौजूदा कार्यकाल में कभी नहीं हो पाएगा. राज्यसभा की बनावट ही ऐसी है कि संसद में वही सरकार क़ामयाब हो सकती है जो लोक-लाज़ के प्रति लचीला रूख़ दिखाते हुए और विपक्ष के साथ ‘कभी नरम कभी गरम’ रहते हुए अपना हित साधने पर ज़ोर देने की रणनीति से चले. क्योंकि अन्ततः चुनावी वादों को पूरा करने और जनता की अपेक्षाओं पर ख़रा उतरने की ज़िम्मेदारी तो सरकार की है. साख़ तो सरकार की दाँव पर लगी होती है. सरकार के पास सीमित समय होता है.
विपक्ष को अपने पाँच साल काटने है. विपक्ष का काम सरकार को सफ़ल बनाना नहीं है. उसे कौन सा जनता को जबाव देना है! उसे तो जायज़ हो या नाजायज़, सरकार से सिर्फ़ सवाल पूछना होता है! सरकार को कटघरे में ख़ड़ा करना होता है! विपक्ष के पास गँवाने के लिए कुछ नहीं होता! इसीलिए सरकार यदि संसद में विपक्ष से निपटने की राह पर चलेगी तो अपना अहित ही करेगी. संसद में देख लेने की बातें तो ‘संख्या बल में कमज़ोर’ विपक्ष ही करता है. लेकिन जेटली के तेवर से तो यही लगता है कि बीजेपी, अभी तक अपनी विपक्षी मानसिकता से उबर नहीं पायी है! उधर, सत्ता का लम्बा तज़ुर्बा रखने वाली काँग्रेस को बीजेपी की कमज़ोरियों के बारे में अच्छी तरह से पता है! जैसे फ़ैमिली डॉक्टर को मरीज़ का अतीत मालूम होता है!
इसीलिए, बीजेपी के रणनीतिकार को काँग्रेस के ‘कठिन दिनों’ से ज़्यादा परवाह अपने ‘मुश्किल दिनों’ की होनी चाहिए! नरेन्द्र मोदी के लिए वक़्त तेज़ी से भाग रहा है, जबकि काँग्रेस के लिए तो ये काटने के दिन हैं! अफ़सोस ये है कि ख़ुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी काँग्रेस की चाल को नहीं समझ पा रहे हैं. उन्होंने भी नोएडा में दिये अपने भाषण में जेटली की तरह ही काँग्रेस को ‘सदाचार’ का उपदेश दिया. मोदी भी ये समझ नहीं पा रहे हैं कि काँग्रेस की ओर से फ़ैलाये जा रहे कीचड़ से अपने विकास के रथ को बाहर निकालने का दारोमदार उन पर ही है. लोकसभा के चुनाव अभी बहुत दूर हैं. अभी काँग्रेस की कलई खोलने से उन्हें कुछ भी हासिल नहीं होगा! जनता की यादाश्त बहुत छोटी होती है!

No comments:
Post a Comment