बीजेपी क्यों भूल गयी कि शीशे के घरों में रहने वाले दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते!
ज़िन्दगी का अचूक दर्शन है, ‘जिनके अपने घर शीशे के हों वो दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते!’ 50 साल पुरानी फ़िल्म ‘वक़्त’ के लिए अख़्तरूल इमान का लिखा ये अमर संवाद है. राजनीति भी भीतर से चाहे जितनी गन्दी हो, ऊपर से तो उसे झाड़-पोंछकर और शीशे के घर की तरह चमकाकर रखा जाता है. लेकिन लगता है कि केन्द्र में पूर्ण बहुमत के साथ पहली बार राज कर रही बीजेपी इन बातों को भूल चुकी है. जिन आरोपों से बीजेपी ख़ुद घिरी है उन्हीं को लेकर वो अरविन्द केजरीवाल को घेरना चाहती है. इससे बीजेपी को तो शायद ही कुछ हासिल होता हो, लेकिन केजरीवाल को नवजीवन मिल जाता है. ताज़ा प्रसंग, दिल्ली में बीजेपी का ‘प्रताड़ित’ आईएएस अफ़सरों के पीछे खड़े होने का है. लेकिन पड़ोस के हरियाणा में वो भी केजरीवाल जैसी हरक़तें ही करती है. यही राजनीति का दोमुँहापन है.
केजरीवाल ने दिल्ली के दो आईएएस अफ़सरों विशेष सचिव (अभियोजन) यशपाल गर्ग और विशेष सचिव (जेल) सुभाष चन्द्रा को इसलिए निलम्बित कर दिया क्योंकि उन्होंने कैबिनेट से पारित उस आदेश की फ़ाइल पर दस्तख़त करने से इनकार कर दिया था जिसके तहत सरकारी वकीलों का वेतन बढ़ाना था. निलम्बन के ख़िलाफ़ दिल्ली-अंडमान-निकोबार कैडर के आईएएस अफ़सरों ने झंडा उठा लिया. केजरीवाल को तानाशाह बताया गया. कहा गया कि निलम्बित करने का अधिकार सिर्फ़ उपराज्यपाल नज़ीब जंग को है. वो भी केन्द्रीय गृह मंत्रालय की इजाज़त के बग़ैर ऐसा नहीं कर सकते. गहमागहमी बढ़ी तो केन्द्र सरकार ने निलम्बन रद्द कर दिया. लेकिन तब तक अफ़सरों ने निलम्बन के विरोध में 1 जनवरी को सामूहिक अवकाश पर रहने का ऐलान कर दिया.
ये केजरीवाल का ‘मॉस्टर डॉयलॉग’ है. वो इसे लाखों बार बोलना चाहते हैं. क्योंकि इस संवाद में वो खुद को ऐसे लाचार व्यक्ति की तरह पेश करते हैं जिसमें जनता की हमदर्दी बटोरने की ताक़त है. इसीलिए केजरीवाल एक ओर तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ख़ूब भला-बुरा कहने से भी परहेज़ नहीं करते. दूसरी ओर, इस हमदर्दी की बदौलत वो अपनी हरेक नाक़ामी का ठीकरा मोदी पर फोड़ने की कोशिश करते हैं. केजरीवाल के वोटरों को इन संवादों पर जितना यक़ीन होगा, उनकी उतनी ही पौ-बारह रहेगी! यही राजनीति का दस्तूर है. लेकिन बीजेपी ये दाँव समझ नहीं पा रही है.
केजरीवाल को क़ानून की दुहाई दी जाती है. क्योंकि दिल्ली बहुत सारे मायने में एक केन्द्र शासित प्रदेश की तरह है. इसे आधा राज्य भी कह सकते हैं. केजरीवाल क़ानूनी सीमाओं को अच्छी तरह जानते हैं. इसीलिए वो तरह-तरह की नाटकीयता फ़ैलाते हुए केन्द्र सरकार के हरेक प्रतीक – उपराज्यपाल, दिल्ली पुलिस, अफ़सरशाही वग़ैरह से आये दिन उलझते रहते हैं. ताकि सुर्ख़ियों में बने रहें. अभी तक तो उनकी रणनीति सफ़ल रही है. अपने काम को बढ़ा-चढ़ाकर बताने में भी उनका कोई सानी नहीं है. जब कभी कोई उन्हें क़ानून का पढ़ाना चाहता है तो बहुत चतुराई से पूरे मुद्दे को ही घुमा देते हैं.
केजरीवाल इस बात का रोना रोते हैं कि चुनी हुई सरकार से बढ़कर और कुछ नहीं. इसे ही सर्वोपरि होना चाहिए. पूर्ण राज्यों के मामले में ऐसा है भी. लेकिन अर्ध राज्य होने के नाते दिल्ली की तमाम अहम शक्तियाँ केन्द्र सरकार के पास हैं. इसके बावजूद, केजरीवाल सियासी फ़ायदा उठा लेते हैं. क्योंकि वो हमदर्दी बटोरने के लिए केन्द्र से टकराव मोल लेते हैं. उन्होंने अपने विशेष सचिव राजेन्द्र कुमार के ऑफ़िस में पड़े सीबीआई के छापे को शानदार ढंग से भुनाया. पूरा दाँव ही पटल दिया. मोदी के सबसे मज़बूत सिपहसालार अरूण जेटली को डीडीसीए मामले में ज़बरदस्त ढंग से लपेट लिया. इससे संसद में कोहराम मचा. जाँच आयोग बिठाने और मानहानि की मुक़दमेबाज़ी हुई. हर मुक़ाबले में केजरीवाल योद्धा बनकर डटे रहे.
अफ़सरों से भिड़न्त, केजरीवाल की रणनीति है. क्योंकि वो केन्द्र सरकार के प्रतीक हैं. इसीलिए चन्द रोज़ पहले केजरीवाल ने अपने परिवहन विभाग के तीन अफ़सरों को ये कहते हुए निलम्बित कर दिया कि वो दस हज़ार ऑटो-परमिट बाँटने वाली योजना में घपला कर रहे थे. इससे पहले उन्होंने दिल्ली में शकूरबस्ती रेलवे स्टेशन के पास अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के सिलसिले में दो एसडीएम को निलम्बित करने का फ़रमान सुनाया था. हालाँकि, वो फ़रमान अमल में नहीं आया. उससे भी पहले केजरीवाल ने उपराज्यपाल नज़ीब जंग के आदेश के बावजूद पूर्व गृह सचिव धर्मपाल को बहाल नहीं किया. धर्मपाल अभी तक हाशिये पर हैं. राज्य सतर्कता विभाग के प्रभारी मुकेश चन्द्र मीणा से भी भिड़न्त हो चुकी है. दिल्ली पुलिस प्रमुख बी.एस. बस्सी के ख़िलाफ़ भी कोआपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी में हेरा-फेरी के आरोप की जाँच हो रही है.
केजरीवाल की सारी मोर्चाबन्दी कई बार उन्हें एक नाटकबाज़ नेता के रूप में उभारती है. लेकिन अगले ही पल वो मामले को भ्रष्टाचार के नारे से जोड़ देते हैं. ताकि ये दिखा सकें कि जो उन्हें ईमानदार नहीं मानते हैं, वो भ्रष्टाचार में लिप्त हैं. इसी कड़ी में केजरीवाल ने एक क़ाबिले-तारीफ़ बात भी की है कि उन्हें ‘निक्कमे’ आईएएस अफ़सरों की फौज़ नहीं चाहिए. वो इनकी जगह ‘विशेषज्ञों’ से काम लेना चाहेंगे. ये भी केजरीवाल का ‘मॉस्टर डॉयलॉग’ है. ये बात सीधे जनता को छूती है. जनता, नेता से नहीं नौकरशाही से त्रस्त है, जो ‘अजेय’ आईएएस की मुट्ठी में है. विकसित देशों में हरेक सरकारी महकमे पर आईएएस जैसा सामन्तवादी तबक़ा कुंडली मारकर नहीं बैठा होता है. जबकि भारतीय राजकरण (Governance) में आईएएस लॉबी अभेद्य है. संविधान ने कार्यपालिका के रूप में इन्हें बहुत मज़बूत बना रखा है. यही देश के असली खलनायक हैं.
दूसरा वाकया, आईपीएस भारती अरोड़ा को ज़बरन एक स्पोर्ट्स स्कूल का प्रिंसिपल बनाये जाने का है. भारती ने अक्टूबर में गुड़गाँव के पुलिस कमिश्नर नवनीत विर्क पर गम्भीर आरोप लगाये थे. वो हाई प्रोफाइल रेप केस की जाँच में दख़लंदाज़ी करने और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का मामला था. लेकिन हरियाणा की बीजेपी सरकार ने भारती को ही निशाना बनाया. उन्हें पुलिस मुख्यालय भेजने के बाद अब प्रिंसिपल बनाया गया है. हरियाणा में ही अशोक खेमका को प्रमोशन का तोहफ़ा दिया गया है. उन्होंने राबर्ट वाड्रा की ज़मीन के मामले में बीजेपी को शानदार मुद्दा मुहैया करवाया था. खेमका का 22 साल की नौकरी में 46 बार तबादला हुआ है.
बहरहाल, विरोधियों को घेरते वक़्त कोई भी पार्टी अपने गिरेबान में नहीं झाँकती. हर पार्टी उल्टे-सीधे, जायज़-नाजायज़, सारे खेल खेलती है. लेकिन मुखौटा ऐसा रखा जाता है जो शीशे की तरह हमेशा चमकता रहे. मुखौटे के दाग़-धब्बों को झूठे बयान रूपी मेकअप से छिपाया जाता है. हरेक पार्टी ऐसे ही ढोंग करती है. सभी अपने बेईमान और भ्रष्ट नेताओं की करतूतों की लीपा-पोती करती हैं. ख़ुद को पाक-साफ़ और विरोधियों को ग़लीज़ बताया जाता है. विरोधियों के आरोप बग़ैर जाँच के ही झूठे, दुर्भावनापूर्ण, बदले की भावना से प्रेरित, शरारतपूर्ण और साज़िश जैसे बताये जाते हैं. कोई कभी नहीं कहता कि उसे क़ानून-अदालत पर भरोसा नहीं है. जबकि सभी क़ानून को ठेंगे पर रखते हैं! यही राजनीति का दोमुँहापन है.
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