Wednesday, January 6, 2016

क्यों किया जा रहा है पंजाब के एसपी की बातों पर शक?

पंजाब के  पुलिस अफसर सलविंदर सिह पीड़ित हैं या संदिग्ध?
पठानकोट !   पंजाब के वरिष्ठ पुलिस अफसर सलविंदर सिह पठानकोट वायुसेना अड्डे पर आतंकी हमले के पीड़ित हैं या संदिग्ध?
जांच एजेंसियां, खासकर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) हमला शुरू होने से पहले के 24 घंटे में सलविंदर की भूमिका की जांच कर रही हैं।
पुलिस अधीक्षक (एसपी) सलविंदर सिह, उनके रसोइये मदन गोपाल और उनके दोस्त राजेश वर्मा, तीनों एक ही घटना के शिकार हैं। तीनों को आतंकियों ने अगवा किया था लेकिन तीनों के बयान एक-दूसरे से मेल नहीं खा रहे हैं। यही वह बात है जिसने जांच एजेंसियों को जिज्ञासु बना दिया है। इसी वजह से एसपी निगाह में आ गए हैं। एनआईए इन तीनों से मंगलवार शाम से पूछताछ कर रही है।
बयानों में एक असंगति आतंकवादियों की संख्या को लेकर है। आतंकवादियों के साथ सबसे दूर तक जाने वाले वर्मा का कहना है कि तीन या चार आतंकवादी थे। एसपी और उनके रसोइये का कहना है कि चार या पांच आतंकवादी थे।
दूसरी असंगति आतंकवादियों द्वारा राइफल के बट से इनकी पिटाई में पाई जा रही है। वर्मा और गोपाल के शरीर पर चोट के निशान हैं। एसपी के शरीर पर नहीं हैं।
जांचकर्ता इसे लेकर उधेड़बुन में हैं कि आतंकवादियों ने टैक्सी ड्राइवर इकागर सिंह का गला काट दिया, उसे चाकू से गोदकर मार डाला, वर्मा का गला भी काटने की कोशिश की। लेकिन, एसपी को खरोंच तक नहीं आई। ऐसा क्यों हुआ?
एसपी का यह भी कहना है कि वह आतंकवादियों की उन बातों को अधिक नहीं सुन सके जो वे आपस में कर रहे थे। वर्मा का कहना है कि आतंकवादियों ने अपने 'कमांडर' से बात की थी और वे एक-दूसरे को अल्फा और मेजर कह कर बुला रहे थे।
सलविंदर का कहना है कि आतंकवादियों ने तीनों लोगों को उनकी गाड़ी के साथ 31 दिसंबर की रात 11.30 बजे अगवा किया। उनका कहना है कि उन्हें और गोपाल को एक नाले में हाथ-पैर-मुंह बांधकर फेंक दिया गया। उनका कहना है कि आतंकवादी उनका दोनों मोबाइल फोन अपने साथ ले गए थे।
लेकिन, गोपाल का कहना है कि एक फोन एसपी के पास ही था और उन्होंने उसी फोन से वरिष्ठ अफसरों से बात की थी।
जांचकर्ता जिन सवालों के जवाब खोज रहे हैं, वे ये हैं:
सीमावर्ती इलाके में एसपी इतनी रात में क्यों घूम रहे थे? एसपी का कहना है कि वह पास में ही स्थित जम्मू एवं कश्मीर के कठुआ स्थित धर्मस्थल जा रहे थे। उनका खुद मानना है कि धर्मस्थल तक जाने के लिए एक अन्य मार्ग और था। तो, फिर एसपी ने उस रात यही रास्ता क्यों चुना? उन्होंने यहां तक कहा है कि उन्हें इस 'शार्ट कट रोड' के बारे में पता नहीं था।
एसपी गाड़ी में अपने साथ अपने गनमैन को लेकर क्यों नहीं जा रहे थे? उनके पास उनका सरकारी हथियार भी क्यों नहीं था?
एक पुलिस अफसर होने की हैसियत से क्या यह उनका दायित्व नहीं था कि वह अपनी जान पर खेलकर भी आतंकवादियों से मुकाबला करते? अगर वह और उनके साथी आतंकियों से भिड़ गए होते तो आतंकियों को हथियार चलाना ही पड़ता और इससे उनके इलाके में होने की बात सभी को पता चल जाती।
एसपी और उनके साथ के लोगों ने चाभी फेंक देने जैसी कोई हरकत कर आतंकियों को गाड़ी पर काबिज होने से रोकने की कोशिश क्यों नहीं की?
सलविंदर का कहना है कि खुद को बंधन से छुड़ाने के बाद उन्होंने तड़के 3.30 बजे वरिष्ठ अफसरों को आतंकियों के बारे में जानकारी दी।
लेकिन, उनकी इस बात को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। अगर उनसे ऊपर के अफसर उनकी बात को गंभीरता से नहीं ले रहे थे तो उन्होंने पंजाब पुलिस के शीर्ष अधिकारियों को क्यों नहीं जानकारी दी?

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