Sunday, January 17, 2016

भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ीं शासकीय योजनाएं,पुल और छोटे बांध खुद बना रहे अबूझमाडिय़ा


 शासन के बनाये पुलों में भ्रष्टाचार इतना अधिक था कि वे चंद महीनों में उखड़ गये। ढांचा भी नहीं बचा। वहीं उन्हें चुनौती देते ग्रामीणों द्वारा मिट्टी और लकड़ी की मदद से बनाये पुल आजीविका का सहारा बन रहे हैं। उल्लेखनीय है कि बीते कुछ सालों से नक्सल प्रभावित जिलों के लिये इंटीग्रेटेड एक्शन प्लान के तहत सालाना 30 करोड़ रुपये आधारभूत संरचना और विकास के लिये दिये जा रहे है। मिजस को रोकने इस राशि का इस्तेमाल किया जाना था लेकिन अबूझमाड़ जैसे इलाकों के लिये कोई योजना इस एलडब्लूई के तहत नहीं बनाई गई। सारी राशि नारायणपुर और उसके आसपास के इलाकों में खर्च कर दी गई।
 जिले के कर्णघारों ने वर्ष 2012-13 में मिली राशि का आधा हिस्सा जल संसाधन विभाग को सौंप दिया। करीब चौदह करोड़ रुपये की लगात से बेनूर, टिमनार, भाटपाल आदि स्थानों पर स्टॉप डेम और एनीकट बनाये गये जो पहली बारिश में ही बह गये। पचास-पचास लाख रुपये की लागत से बनाए गये इन ढांचों में इतना भ्रष्टाचार था कि पांच महीने भी येे ढंाचे टिक ना सके। अबूझमाड़ के लोग जो इस जिले में इस योजना के सबसे बड़े हकदार थे उन्हें फूटी कौड़ी भी नहीं मिली। अबूझमाड़ के जाटलूर, कुडमेल,मुरूमवाड़ा, बोटेर और दोदेंर बेड़ा के आदिवासियों ने खुद ही श्रमदान कर बांस, लकड़ी और मिट्टी से एनिकट स्टाप डेम और छोटे -छोटे पुल बना डाले। आईएपी तो दूर की बात है मनरेगा के तहत भी उनकी इन मूलभूत जरूरतों को पूरा नहीं किया जा सका। नारायणपुर के आसपास जहां अनावश्यक रूप से मनरेगा के फर्जी मस्टर रोल भरकर करोड़ो ंकी हेरा फेरी की गई वहां सीमेंट और लोहे के स्ट्रक्चर चंद महीनों में ही बह गए । रोजगार  की गारंटी से अनजान अबूझमाडिय़ों ने खुद ही प्राकृतिक संसाधनों से अपनी जरूरतों को पूरा करने का प्रयास किया। नैसर्गिक रूप से सहकारिता का महत्व समझने वाले अबूझमाडिय़ा आज भी सामूहिक रूप से खेती कर रहे हैं और प्राकृतिक जल सोतो को किसी सरकारी मदद के बिना सिर्फ मिट्टी और लकड़ी की मदद से अपनी आजीविका की तरफ मोड़ रहे है। तमाम चुनौतियों के बीच जैसे शासन को चुनौती दे रहे है, कि हमारे पुल और छोटे बांध सीमेंट और लोहे की बनी सरकारी बांधों से कहीं ज्यादा मजबूत है।
आईएपी की राशि का दुरूपयोग
बीते सालों में नारायणपुर जिले की आई.ए.पी मद के अन्तर्गत मिली राशि का दुरूपयोग हुआ। अन्दरूनी इलाकों में जहां इस राशि की सर्वाधिक व्यवस्था थी वहांं के लिये कोई भी योजना नहीं बनाई गई। अफसरों ने अपनी सुविधा का ध्यान रखते हुए जिला मुख्यालय के आस-पास अनुपयोगी कार्यों में इस राशि का बड़ा हिस्सा खर्च कर डाला। खास तौर पर सिंचाई विभाग को अव्यवहारिक ढंग से कुल प्राप्त फंड की आधी रकम दे दी गई। आनन फानन में एक ही जगह पर कई एनीकट और स्टाप डेम बना दिये गये जो पहली ही बारिश में बह गये।

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